लखनऊ। भगवद्गीता के आध्यात्मिक संदेश और ध्यान साधना को केंद्र में रखकर राजधानी लखनऊ में चार दिवसीय ओशो गीता ध्यान यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। दिव्य प्रेम ध्यान साधना फाउंडेशन की ओर से आयोजित यह शिविर कानपुर रोड स्थित आनंदी मैजिक वर्ल्ड रिसार्ट में आयोजित किया जा रहा है। आयोजन में देश के विभिन्न हिस्सों के साथ विदेशों से भी करीब 250 साधक-साधिकाओं के शामिल होने की जानकारी दी गई है।
चार दिनों तक चलने वाले इस शिविर में ओशो के भगवद्गीता पर दिए गए प्रवचनों और उनके आध्यात्मिक दृष्टिकोण के माध्यम से ध्यान एवं आत्मचिंतन पर चर्चा होगी। आयोजकों के मुताबिक ओशो ने वर्ष 1970 से 1975 के बीच गीता के सभी 18 अध्यायों की विस्तृत व्याख्या की थी। इन्हीं प्रवचनों में निहित विचारों को ध्यान साधना के साथ जोड़कर शिविर में प्रस्तुत किया जाएगा।
दिव्य प्रेम ध्यान साधना फाउंडेशन की मुख्य आयोजिका दिव्य ज्योति ने बताया कि शिविर में ध्यान सत्रों और आध्यात्मिक कार्यक्रमों का संचालन देश-विदेश से आए ओशो संन्यासियों द्वारा किया जाएगा। इनमें हरियाणा से ओशो अनुज स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती, गुरु मां अमृता प्रिया और मां मंजुषा, नेपाल से मां अनामिका, दिल्ली से स्वामी चैतन्य सागर तथा महाराष्ट्र से स्वामी दिगंबर प्रमुख रूप से शामिल हैं।आयोजकों ने साधकों से ध्यान सत्रों में सहजता बनाए रखने के लिए सफेद या मैरून रंग के ढीले वस्त्र पहनकर आने का अनुरोध किया है।
शिविर के दौरान अपने विचार रखते हुए मां अमृता प्रिया ने कहा कि गीता को केवल पढ़ने या बौद्धिक रूप से समझने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उसके संदेश को जीवन में उतारने का प्रयास होना चाहिए। उनके अनुसार लंबे समय से गीता का अध्ययन और चिंतन होता रहा है, लेकिन उसके मूल संदेश को व्यवहार में अपनाना अधिक महत्वपूर्ण है।
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने गीता के 13वें अध्याय का संदर्भ देते हुए शरीर और आत्मा के संबंध को समझाया। उन्होंने कहा कि गीता शरीर को ‘क्षेत्र’ और उसे जानने वाली चेतना को ‘क्षेत्रज्ञ’ के रूप में समझाती है। उनके अनुसार इस अंतर की समझ आध्यात्मिक चिंतन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
नेपाल से आईं मां अनामिका ने ध्यान की ओशो की दृष्टि को साझा करते हुए कहा कि ध्यान को कठिन तपस्या या गंभीर प्रक्रिया के रूप में देखने के बजाय सहजता और आनंद के साथ अनुभव किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हंसी, नृत्य और संगीत के माध्यम से भी व्यक्ति भीतर की चेतना से जुड़ने का प्रयास कर सकता है।
उन्होंने ओंकार को अस्तित्व में व्याप्त आध्यात्मिक ध्वनि के रूप में बताते हुए कहा कि गीता में इसे जानने योग्य पवित्र तत्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ध्यान यज्ञ में साधकों को इसी अनुभव की ओर ले जाने वाले विभिन्न ध्यान सत्र आयोजित किए जाएंगे।
कार्यक्रम में दिल्ली से स्वामी चैतन्य सागर तथा मध्य प्रदेश से मां मंजुषा और स्वामी दिगंबर ने भी अपने विचार रखे। आयोजकों के अनुसार चार दिनों के दौरान ध्यान, प्रवचन और आध्यात्मिक संवाद के विभिन्न सत्र आयोजित होंगे।

