देहरादून – मान्यता प्राप्त पत्रकारों में विशेष तौर पर जिला स्तरीय मान्यता की संख्या को घटाने की डीजी बंशीधर तिवारी की भावना के सम्मान में लघु समाचारपत्र एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेन्द्र अग्रवाल ने अपनी पत्रकार मान्यता वापस कर दी। आज जिला सूचना अधिकारी देहरादून को इस आशय का लिखित पत्र सौंप दिया गया है।
सूचना निदेशालय में महानिदेशक बंशीधर तिवारी आजकल पत्रकारों की मान्यता घटाने की कोशिश में दिखते हैं। संभवतया वह चिकित्सा प्रतिपूर्ति में होने वाले व्यय को घटाने के दृष्टिकोण से और अन्य कारणों से पत्रकार मान्यता की संख्या घटाना चाहते हैं।
डीजी साहब की मंशा का सम्मान करते हुए पत्रकार सुरेन्द्र अग्रवाल ने पहल करते हुए अपनी पत्रकार मान्यता वापस कर दी है।
A- विज्ञापन कार्य करने की पाबंदी नहीं मानते है जायज :-
जिला सूचना अधिकारी द्वारा दिनांक 24/12/25 को एसएसपी देहरादून को लिखे पत्र के कालम 6 में एलआईयू के माध्यम से जानकारी मांगी गई है कि सम्बंधित पत्रकार विज्ञापन का कार्य करते हैं या नहीं।
साथियो, ‘पत्रकार मान्यता’ पत्रकार के लिए एक सम्मान होता है। मान्यता में कुछ सुविधाएं मिलती हैं लेकिन कोई मानदेय तो मिलता नहीं है। अतः एक पत्रकार विशेषकर लघु समाचारपत्र के पत्रकारों को जीवकोपार्जन के लिए विज्ञापन कार्य करना होता है।
एलआईयू जांच में यदि विज्ञापन कार्य करने की बात लिख दी जाती है तो विपरीत एलआईयू रिपोर्ट मानकर मान्यता खारिज कर दी जाती है।सूचना विभाग की इस सोच से कतई सहमत नहीं हुआ जा सकता है।
B-केवल एफआईआर दर्ज होने से किसी पत्रकार को अपराधी मान लेना घोर अन्याय :-
जिला सूचना अधिकारी के पत्र के कालम सात में आपराधिक मुकदमा चलने की जानकारी मांगी गई है। जबकि यह पूछा जाना चाहिए था कि सम्बंधित को किसी मामले में दोषी माना गया है या नहीं। कभी कोई दोष सिद्ध हुआ है या नहीं।
C-निर्भीक और बेवाक लेखन वाले पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज होना, उनके लिए मैडल के समान है :-
यदि कोई भी पत्रकार जनहित को सर्वोच्च मानकर बेवाक और निर्भीक रिपोर्टिंग करता है। यदि किसी थाने में निर्दोषों पर होने वाले जुल्मों को स्पष्टवादिता से लिखता है। तो मुकदमा तो दूर कई बार थर्ड डिग्री का शिकार भी होना पड़ता है।अतः एफआईआर दर्ज होने मात्र से पत्रकार को अपराधी घोषित करने जैसे बिंदु से कतई सहमत नहीं हुआ जा सकता है।
D- कभी आचार संहिता का उलंघन तो नहीं किया गया है :-
इस आलेख का लेखक लगभग 35 वर्षों से पत्रकार है। लेकिन उसे अभी तक पत्रकारों के लिए निर्धारित आचार संहिता का ज्ञान नहीं हो सका है।पता नहीं इस पत्र को ड्राफ्ट करने वाले विद्वान महोदय कौन सी आचार संहिता का पालन पत्रकारों से कराना चाहते हैं।
आचार संहिता शब्द तो चुनाव के दौरान प्रत्याशियों के संदर्भ में सुनाई देता है। अब एलआईयू वाले को पता होगा ‘आचार संहिता का मतलब। सूचना विभाग की ऐसी शर्त का पालन तो दूर सुना भी नहीं जा सकता है।
D-दो शब्द:- मान्यता वापस करने वाले सुरेन्द्र अग्रवाल डायबिटीज, बीपी, हार्ट आदि की दवा क्रय के बिलों की प्रतिपूर्ति का भुगतान अवश्य लेते है,जोकि एक मान्यता प्राप्त पत्रकार का अधिकार भी है। परन्तु इन दिनों मान्यता रिनूवल में जिस प्रकार से प्रकारांतर से बदसलूकी सहनी पड़ रही थी। उससे सूचना विभाग से प्रतिपूर्ति वाली दवा खाना उन्हें निरंतर कचोट रहा था। इसलिए अब जबकि मान्यता वापस लौटा दी है। तो जीवित रहना है तो दवा स्वयं खरीदेंगे।
साथियो, मुझ में आत्मसम्मान अभी बचा है।🙏

